अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के दूसरे दिन होली काऊ' आई पेड' तथा रोड टू संगम फिल्म दिखाई गई
कल तीसरे दिन होगी अभिनेता यशपाल शर्मा की क्लॉस
रायपुर. चौथे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के दूसरे दिन आज सिनेप्रेमियों को फिल्म होली काऊ' आई पेड' तथा रोड टू संगम' देखने का अवसर मिला. इस दौरान फिल्मों ने जहां सामाजिक संदेश दिए, वहीं नवोदित फिल्मकारों को फिल्मों के माध्यम से निर्देशन, तकनीकी गुणवत्ता तथा कंटेंट राइटिंग की बारीकियां सीखने—समझने को मिली. वेब मीडिया और कंटेंट राइटिंग पर फिल्म निर्माता अमित राय, केतन बारु तथा अजीत रॉय की क्लास भी लगी.
संस्कृति भवन स्थित महंत घासीदास संग्रहालय परिसर में चल रहे फिल्मोत्सव ने जोर पकड़ लिया है. आज प्रदर्शित हुई फिल्मों को देखने के लिए सैकड़ों लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया तथा सशुल्क फिल्मों का आनंद उठाया. शुरूआत फिल्म निर्माता सूरज कुमार की गोरक्षा के नाम पर मची हिंसा मॉब लिंचिंग पर आधारित डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘होली काऊ’ के प्रदर्शन से हुई. देश भर में भीड़ द्वारा की जारी हिंसा और हत्याओं को बहुत बेबाकी से दिखाने का साहस सूरज कुमार ने किया है. एक ठोस रिसर्च के आधार पर लिखे गए सधे स्क्रिप्ट के साथ दृश्यों का ईमानदार संयोजन इस डाक्यूमेंट्री में देखते ही बनता है। इस कारण समाज के हर पक्ष को शामिल कर समय और दर्शकों के साथ न्याय करने का एक ईमानदार प्रयास है।
इसके बाद बारी आई युवा फिल्मकार अमित राय की जिनकी बहुचर्चित फिल्म आई पैड' का प्रदर्शन हुआ. फिल्म महिलाओं के मासिक धर्म और इस दौरान उपयोग होने वाले सेनेटरी नैपकीन पर केंद्रित है. कहानी कुछ यूं है कि नटराज बंकर एक अनपढ़ लेकिन सरल आदमी है जो बेहद सामान्य नौकरीपेशा इंसान है. उनकी शिक्षित पत्नी सावी उनकी प्रतिभा को महत्व नहीं देती। एक दिन, जब उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी मासिक धर्म के दौरान कपड़े के टुकड़े का उपयोग करती है क्योंकि वे बाजार में उपलब्ध सैनिटरी नैपकिन खरीदने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं तो वह एक सस्ता विकल्प बनाने का फैसला करता है। उनकी इच्छा एक जुनून बन जाती है क्योंकि वह और उनके मुस्लिम दोस्त पेंसिल (विजय मिश्रा) विडंबना और तड़प-हास्य स्थितियों के लिए कई बाधाओं का सामना करते हैं।
फिल्म उसके सभी पहलुओं पर बेहद कसी हुई रही. श्री रॉय ने बताया कि फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार की फिल्म पैडमेन' बाद में आई लेकिन इसके पहले ही उन्होंने इस डाक्यूमेंट्री को बना लिया था.
फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान बीच—बीच में मास्टर क्लास भी लगाई गई. स्कूलों व महाविद्यालयों से आए विदयार्थियों ने तथा फिल्म बनाने के इच्छुकजनों ने इन क्लासों का पूरा फायदा उठाया. फिल्म निर्माता अमित राय ने फिल्म के निर्देशन, तकनीकी पक्ष और कंटेंट राइटिंग पर केंद्रित सवालों के जवाब दिए, वहीं शमारू इंटरटेनमेंट के बिजनेस हेड केतन बारु ने फिल्म या डाक्यूमेंट्री के बिजनेस पक्ष से जुड़ी समस्याएं, सुझाव और सवालों के जवाब दिए. एनएसडी के प्रोफेसर अजीत रॉय की क्लास भी लगी. उन्होने हॉलीवुड—बॉलीवुड की फिल्मों का विश्लेषण किया और उन कारणों पर प्रकाश डाला जिसके चलते फिल्में हिट होती हैं या अवार्डस पाती हैं.
देशभक्ति की यात्रा है 'रोड टू संगम'
दूसरे दिन का समापन फ़िल्म ‘रोड टू संगम’ के प्रदर्शन से हुआ. परेश रावल और ओमपुरी के अभिनय से सजी इस फ़िल्म में गांधी जी के सिद्धांतो और मूल्यों को दिखाने की कोशिश की गई है. ऐसे में जबकि कमर्शियल फिल्में लोगों के जेहन में छाई हुई हैं, ‘रोड टू संगम’ फ़िल्म का आना एक महज इत्तफाक़ ही कहा जा सकता है. काफ़ी लंबे समय के बाद एक ऐसी फिल्म दर्शकों तक पहुंच रही है जिसका एक ऐतिहासिक संदर्भ है.
‘रोड टू संगम’ की कहानी एक मुस्लिम मैकेनिक हशमत उल्लाह के इर्द-गिर्द घूमती है जिसके पास उस ट्रक का इंजन रिपेयर करने के लिए आता है जिसमें कभी महात्मा गांधी की अस्थियों को इलाहाबाद के संगम पर विसर्जित करने के ले जाया गया था. स्थिति तब गंभीर हो जाती है जब शहर में एक बम धमाका हो जाता है और पुलिस मुस्लिम युवकों की धरपकड़ शुरु करती है.इसके खिलाफ़ कुछ मुस्लिम नेता खड़े होते हैं और वो उस इंजन की मरम्मत का विरोध करते हैं. अब हशमत उल्लाह के सामने सबसे बड़ी मुश्किल है कि क्या वो उस इंजन की मरम्मत करे जिससे किसी हिंदू की अस्थियों को लाया गया था या अपनी क़ौम का साथ देते हुए उस इंजन की मरम्मत करने से इनकार कर दे. भारत में रिलीज़ होने से पहले रोड टू संगम को कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में दिखाया जा चुका है और इसने कई पुरस्कार भी जीते हैं. ओम पुरी, परेश रावल और पवन मल्होत्रा अभिनीत इस फिल्म के निर्देशक भी अमित राय हैं.
फिल्मोत्सव को सफल बनाने में टीम के वरिष्ठ सदस्य श्रीमती रचना मिश्रा, अजीज कादिर, सौरव मिश्रा, हेमंत यादव, गौरव मुंजेवार, साकेत साहू, मिजान, शुभम वर्मा, संध्या वर्मा, अमित जैन, सचिन साहू, रोशन आदित्य, अनवंशिका, राज भारद्वाज, कौशल विश्वकर्मा आदि का उल्लेखनीय योगदान रहा.
महात्मा गांधी, मॉब लिंचिंग तथा महिला-केंद्रित मुददों से जुड़ी फिल्में छाई रहीं
• ABDUL HAMEED